हमारी पाचन प्रणाली भोजन को पचाती है और उसमें से पोषक तत्वों को अवशोषित करती है। ग्रासनली (भोजन की नली), पेट (अमाशय), छोटी आंत और बड़ी आंत मिलकर पाचन तंत्र बनाते हैं। बड़ी आंत, कोलन से शुरू होती है, जो लगभग 5 फीट लंबा होता है और मलाशय (rectum) और गुदा (मलाशय) में समाप्त होती है।
कोलन और मलाशय की दीवार में ऊतक की चार परतें होती हैं। कैंसर तब होता है जब शरीर में कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं। कोलोरेक्टल कैंसर की शुरुआत बड़ी आंत की दीवार के सबसे भीतरी परत में होती है।
अधिकांश कोलोरेक्टल कैंसर छोटे पॉलीप्स से शुरू होते हैं। ये पॉलिप्स कोशिकाओं का एक समूह होते हैं। समय के साथ, इनमें से कुछ पॉलीप्स कैंसर में विकसित हो जाते हैं। यह कैंसर पहले बड़ी आंत की दीवार में, फिर आसपास के लिंफ नोड्स में और फिर पूरे शरीर में फैलता है।
सभी पॉलीप्स कैंसर में विकसित नहीं होते हैं। पोलिप के कैंसर में विकसित होने की संभावना पॉलीप्स के प्रकार, माप और संख्या पर निर्भर करती है।
अगर कोलोरेक्टल कैंसर का समय पर पता लग जाए और उचित उपचार किया जाए तो इसका इलाज संभव है।
कोलन कैंसर और रेक्टल कैंसर काफी कुछ मिलते जुलते हैं और कोलोरेक्टल कैंसर के नाम से एक साथ इनकी चर्चा की जाती है। लेकिन मलाशय एक संकीर्ण जगह में होता है जिसे श्रोणि (pelvis) कहा जाता है। यहां पर वो आस-पास के अंगों और श्रोणि की हड्डी से चिपका हुआ होता है। इस कारण रेक्टल कैंसर की जांच और निदान का तरीका थोड़ा अलग होता है।
इनमें से अधिकांश कैंसर एडेनोकार्सिनोमा होते हैं। न्यूरोएंडोक्राइन (कार्सिनॉइड) ट्यूमर, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल स्ट्रोमल ट्यूमर, लिम्फोमा और सार्कोमा भी बड़ी आंत में हो सकते है, पर दुर्लभतः ही पाए जाते हैं।
कभी-कभी कोशिका विभाजन के दौरान एक स्वस्थ कोशिका के डीएनए में बदलाव आ जाता है। इससे उस कोशिका में अनियंत्रित विकास होने लगता है और कैंसर बनता है। जिस किसी भी चीज से किसी को कैंसर होने का खतरा बढ़ता है, उसे जोखिम कारक कहते हैं। जोखिम कारक बीमारी कराता नहीं है यह केवल जोखिम को बढ़ाता है।
कोलोरेक्टल कैंसर के रोगियों के एक छोटे प्रतिशत, (लगभग 5%) में जीन परिवर्तन होता है जो अनुवांशिक होता है और जोखिम को बढ़ाता है।
पेट के बाकी कैंसर की तरह बड़ी आंत में गाँठ के भी शुरुआती चरणों में सामान्यतः कोई लक्षण नहीं होते हैं।
कोलन कैंसर और रेक्टल कैंसर के लक्षणों में शामिल है:
ध्यान दें कि इनमें से कई लक्षण कोलोरेक्टल कैंसर के अलावा अन्य बीमारियों में भी हो सकते हैं।
एक चिकित्सक द्वारा लक्षणों को समझना और संकेतों की जांच करना बीमारी तक पहुंचने के लिए जरूरी है।
ट्यूमर से थोड़ा-थोड़ा रक्तस्राव होता है जो आंखों को दिखाई नहीं देता है। इन टेस्ट के द्वारा इसका पता चलता है। यह टेस्ट दो प्रकार के होते हैं:
कोलोनोस्कोपी से कोलोरेक्टल कैंसर की पुष्टि होती है।
कोलोनोस्कोप एक लचीली पतली ट्यूब होती है, जिसमें एक कैमरा होता है। यह आपकी बड़ी आंत के अंदर की छवि को एक मॉनिटर पर प्रसारित करता है। यदि कोई असामान्यता मिलती है, तो उसमें से एक छोटा सा नमूना भी लिया जाता है, जिसे बायोप्सी कहा जाता है।
बड़ी आंत की जांच के लिए एक विशेष रूप का सीटी स्कैन किया जाता है। इसे कोलोनोग्राफी भी कहते हैं।
बायोप्सी का अर्थ है कि ट्यूमर के एक छोटे से हिस्से का नमूना लेना और माइक्रोस्कोप के द्वारा इसकी जांच करना। यह पैथोलॉजिस्ट द्वारा किया जाता है। यदि आवश्यक हो तो बायोप्सी नमूनों पर जीन परीक्षण भी किया जा सकता है।
कैंसर की गांठ से कैंसर कोशिकाएं निकलती है और शरीर में तीन प्रकार से फैलती हैं:

कैंसर का फैलाव स्थानीय हो सकता है, कोलन, उसके आसपास के उत्तकों में और लिंफ नोड्स में। या दूरवर्ती हो सकता है, लिवर, फेफड़े और पेट के अंदर की परत (पेरीटोनियम) में। कैंसर जब दूर के अंगों में फैल जाता है तो उसे मेटास्टैसिस कहते हैं।
स्टेजिंग से बीमारी के प्रसार का पता चल रहा है। पेट के कैंसर का पता चलने के बाद, हम यह पता लगाने के लिए परीक्षण करते हैं कि ट्यूमर कितना फैल गया है।
यह वर्गीकरण तीन प्रमुख तत्वों पर आधारित है:
कोलोरेक्टल कैंसर चरण I से IV तक होता है। चरण I से III तक स्थानीयकृत रोग होता है और चरण IV फैला हुआ कैंसर है।
बड़ी आंत में गांठ का इलाज
शुरुआत के चरणों के कोलोरेक्टल कैंसर का प्राथमिक उपचार सर्जरी है।
इसमें बड़ी आंत के कैंसर वाले हिस्से को आस पास के लिम्फ नोड्स के साथ निकाला जाता है। फिर आंत के कटे हुए हिस्सों को आपस में जोड़ कर आंत की निरंतरता को पुन: स्थापित करते हैं (एनास्टोमोसिस)।
बढ़े हुए रेक्टल ट्यूमर में सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और सर्जरी को संयोजित किया जाता है। वर्तमान में रेक्टल कैंसर के उपचार में कीमोथेरेपी या कीमोरेडिओथेरपी पहले दी जाती है जिसे नियोएडजुवेंट उपचार कहा जाता है, इसके बाद सर्जरी की जाती है।
पेट की ओपन सर्जरी में बड़ा चीरा लगता है और इसकी वजह से ठीक होने में वक्त लगता है और अस्पताल में लंबे समय तक रहना पड़ता है। मिनिमली इनवेसिव सर्जरी का अर्थ है "कम दर्द", "न्यूनतम निशान" और "तेज़ रिकवरी"। आईसीयू और अस्पताल में कम रहना पड़ता है। बड़े मॉनिटर पर पेट के अंदर का दृश्य बड़ा होने के कारण सर्जरी के दौरान रक्त की हानि कम होती है। आप जल्दी से चलना और मुँह से खाना शुरू कर सकते हैं। ओपन सर्जरी की तुलना में इन्फेक्शन और हर्निया का खतरा भी कम होता है।

कोलोरेक्टल कैंसर, सभी चरणों में 5 वर्ष तक जीवित रहने की संभावना:
यदि हम बीमारियों का पता समय पर लगा सकें, तो हम उनका बेहतर इलाज कर सकते हैं।
स्क्रीनिंग द्वारा उनमें बीमारियों का पता लगाया जा सकता है जो बाहरी तौर पर स्वस्थ हैं और जिन्हें बीमारी के कोई लक्षण नहीं हैं।
एक असामान्य कोशिका को कोलोरेक्टल कैंसर में विकसित होने में 10-15 साल लगते हैं। हम उन्हें पॉलीप के चरण में भी निकाल सकते हैं और कैंसर को होने से रोक सकते हैं।
हम कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम कारकों को परिवर्तनीय और गैर-परिवर्तनीय में वर्गीकृत कर सकते हैं। आयु और आनुवंशिक कारक गैर-परिवर्तनीय हैं और हम इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते हैं।
लेकिन हम उन जोखिम कारकों से बचकर जोखिम को कम कर सकते हैं जिन्हें हम नियंत्रित कर सकते हैं।
हम निम्नलिखित कदम उठाकर अपने जोखिम को कम कर सकते हैं:
सतर्क रहें! स्वस्थ रहें! और खुश रहें!

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